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ग़ज़ल
चुप जो रहता हूँ तो हूँ बरसर-ए-महफ़िल मुजरिम
अर्ज़ करता हूँ तो सरकार पे हर्फ़ आता है
फ़रताश सय्यद
ग़ज़ल
ये तमाशा भी मिरे दिल को जिला कर देखो
शम्अ' हसरत से जली बर-सर-ए-महफ़िल क्यूँकर
जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल
'बेबाक' मिटा सकता नहीं हम को ज़माना
हम हक़ के लिए बर-सर-ए-पैकार रहे हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
देख कर शौक़-ए-शहादत बर-सर-ए-मक़्तल मिरा
क़ातिलों ने हाथ से घबरा के ख़ंजर रख दिए