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ग़ज़ल
और बा-मा'नी हुआ तश्कीक का पिछ्ला निसाब
क्या कहूँ अहल-ए-यकीं ने क्या गुमाँ पर लिख दिया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
मुझे तो चश्म-ए-गुरेज़ाँ भी इल्तिफ़ात लगी
तिरे सितम पे भी ईसार का गुमाँ गुज़रा
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
मुद्दत में तुम मिले हो क्यूँ ज़िक्र-ए-ग़ैर आए
मैं अपने साए से भी ख़ल्वत में बद-गुमाँ हूँ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
फ़ारूक़ नाज़की
ग़ज़ल
कोई मिलता ही नहीं वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-जुनूँ
अब तो बस्ती ही अलग अपनी बसा ली जाए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
ऐसी बस्ती में मियाँ अम्न-ओ-अमाँ का क्या सवाल
सुल्ह-जू कम हों जहाँ पर और बलवाई बहुत
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
रक़ीबाँ की न कुछ तक़्सीर साबित है न ख़ूबाँ की
मुझे नाहक़ सताता है ये इश्क़-ए-बद-गुमाँ अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
मुल्क-ए-तरब के रहने वालो ये कैसी मजबूरी है
होंटों की बस्ती में चराग़ाँ दिल के नगर इतने सुनसान
इब्न-ए-सफ़ी
ग़ज़ल
दिलों में जब गुमाँ होंगे मकीं आहिस्ता आहिस्ता
तो धुँदला जाएगा नूर-ए-यकीं आहिस्ता आहिस्ता