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ग़ज़ल
मैं 'बज़्म' सोज़-ए-तग़ाफ़ुल से जल बुझा लेकिन
उसे न ज़हमत-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दी मैं ने
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
मोहब्बत ज़िंदगी है 'बज़्म' लेकिन लोग कहते हैं
कि जाम-ए-ज़हर को समझा है जाम-ए-अंगबीं मैं ने
बज़्म अंसारी
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ग़ज़ल
गुरेज़ 'बज़्म' ज़रूरी है इल्तिफ़ात में भी
हो रस्म-ओ-राह तो हद से कभी बढ़ूँ भी नहीं
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
वो 'बज़्म' जो दिल-ओ-जाँ से 'अज़ीज़ था हम को
उसी 'अज़ीज़ ने दी हैं अज़िय्यतें क्या क्या
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
किए शाना रीश को याँ अबस आए शैख़ जी तुम
कि ये जम-ए-बज़्म-ए-रिंदाँ है फ़रीक़-ए-रीश-ख़ंदाँ
वलीउल्लाह मुहिब
ग़ज़ल
बज़्म-ए-रिंदाँ में तिरा वा'ज़ है इक फ़े'ल-ए-अबस
किस को फ़ुर्सत जो करे तेरी समाअ'त वाइज़
मुंशी ठाकुर प्रसाद तालिब
ग़ज़ल
हज़रत-ए-वाइ'ज़ कहाँ अब बज़्म-ए-रिंदाँ में शराब
जाम-ओ-मीना देखिएगा जाम-ओ-मीना देखिए