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नज़्म
ऐ मिरी हमदम-ओ-दम-साज़
ये गिरानी-ए-शब-ए-हिज्र कहाँ तक आख़िर
तीरगी वक़्त के सैलाब से छट जाएगी
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
मैं 'बज़्म' सोज़-ए-तग़ाफ़ुल से जल बुझा लेकिन
उसे न ज़हमत-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दी मैं ने
बज़्म अंसारी
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ग़ज़ल
गुरेज़ 'बज़्म' ज़रूरी है इल्तिफ़ात में भी
हो रस्म-ओ-राह तो हद से कभी बढ़ूँ भी नहीं
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
वो 'बज़्म' जो दिल-ओ-जाँ से 'अज़ीज़ था हम को
उसी 'अज़ीज़ ने दी हैं अज़िय्यतें क्या क्या
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
'बज़्म' मद्दाह भी है आप का और ज़ाकिर भी
रहम क्यों इस पे नहीं ऐ शह-ए-मर्दां होता
आशिक़ हुसैन बज़्म आफंदी
ग़ज़ल
पहुँच कर सामने उन के न फिर आवाज़ निकलेगी
यहाँ ऐ हज़रत-ए-दिल जितना चाहो शोर-ओ-शर कर लो
आशिक़ हुसैन बज़्म आफंदी
ग़ज़ल
बज़्म से उस की चले आओ जो बिगड़ा वो बुत
बैठने को कोई फ़िक़रा भी बनाया न गया
आशिक़ हुसैन बज़्म आफंदी
ग़ज़ल
पढ़ी ऐ 'बज़्म' जब मैं ने ग़ज़ल कट कट गए हासिद
रही हर मा'रका में तेज़ शमशीर-ए-ज़बाँ मेरी
आशिक़ हुसैन बज़्म आफंदी
ग़ज़ल
ऐ 'बज़्म' उठा करता है क्यों दर्द जिगर में
सच कह किसे देखा कि तबीअत नहीं अच्छी

