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क़ितआ
आया था बज़्म-ए-शेर में अर्ज़-ए-हुनर को मैं
अब जा रहा हूँ ढूँडने अहल-ए-नज़र को मैं
हफ़ीज़ जालंधरी
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bazm-e-she'r-o-adab
बज़्म-ए-शे'र-ओ-अदब بَزْمِ شِعْر و اَدَب
कविता और साहित्य की महफ़िल
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ग़ज़ल
वो 'उम्र 'बज़्म' कि जिस का सुराग़ ही न मिला
उस उम्र-ए-रफ़्ता की इक यादगार दिल ही तो है
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
गुरेज़ 'बज़्म' ज़रूरी है इल्तिफ़ात में भी
हो रस्म-ओ-राह तो हद से कभी बढ़ूँ भी नहीं
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
वो 'बज़्म' जो दिल-ओ-जाँ से 'अज़ीज़ था हम को
उसी 'अज़ीज़ ने दी हैं अज़िय्यतें क्या क्या
बज़्म अंसारी
ग़ज़ल
गाहे माहे ऐ मह-ए-ईद इधर भी तो गुज़र
रोज़ ओ शब बज़्म में तेरा ही बयाँ रहता है
शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान
ग़ज़ल
है मुझ को सोच देखिए क्या होवे बज़्म में
इन अँखड़ियों की वज़्अ-ए-इशारात और है
मीर शेर अली अफ़्सोस
ग़ज़ल
बैठा हुआ हूँ बज़्म में इक सीम-तन के साथ
साक़ी लगा दे साग़र-ए-ज़र्रीं दहन के साथ
शेर सिंह नाज़ देहलवी
ग़ज़ल
पहुँच कर सामने उन के न फिर आवाज़ निकलेगी
यहाँ ऐ हज़रत-ए-दिल जितना चाहो शोर-ओ-शर कर लो
