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नज़्म
जिला
तेरे लिए आसमानों से कोई मो'जिज़ा नहीं उतरा
उजड़ा हुआ घर बे-बिज़ाअ'ती ज़मीन-ओ-आसमान की सख़्तियाँ
इंजिला हमेश
ग़ज़ल
बिसात-ए-रंग-ओ-बू आतिश-फ़िशाँ मालूम होती है
रग-ए-गुल में निहाँ बर्क़-ए-तपाँ मालूम होती है
लक्ष्मी नारायण फ़ारिग़
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नज़्म
मिरे अहद के हसीनो
हो हज़ार कोशिशों पर भी शुमार में न आए
कभी ख़ाक-ए-बे-बिज़ाअत के दयार में न आए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
वो अपने हाथ में दुनिया की तहज़ीबें उठाए आएगी
समुंदर बे-बिज़ाअत है उगल देता है नीली कश्तियों को
आसमाँ खिड़की से बाहर फेंक देता है जहाज़ों को
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
ग़ज़ल
तमानिय्यत की लाज़िम शर्त है ख़ुश-निय्यती वर्ना
तग-ओ-दौ बे-बिज़ाअत और सारी हाओ-हू आतिश