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शेर
हुस्न भी कम्बख़्त कब ख़ाली है सोज़-ए-इश्क़ से
शम्अ भी तो रात भर जलती है परवाने के साथ
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
बे-पनाही है यही 'बिस्मिल' जो हुस्न-ओ-इश्क़ की
होगी ना-काफ़ी हयात-ए-जाविदाँ मेरे लिए
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
हुस्न भी कम्बख़्त कब ख़ाली है सोज़-ए-इश्क़ से
शम' भी तो रात-भर जलती है परवानों के साथ
बिस्मिल सईदी
ग़ज़ल
मिरा क्या साथ देंगे ग़ैर बहर-ए-इश्क़ में 'बिस्मिल'
वो उस कश्ती में हैं जो दामन-ए-साहिल में होती है
बिस्मिल सईदी
हम्द
है दु'आ-ए-बिस्मिल-ए-नीम-जाँ कि मिरी ख़ताओं को भूल जा
है मुझे तो तेरा ही आसरा तू हलीम है तू रहीम है