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ग़ज़ल
मबादा बात में बू-ए-तमअ अगर पावें
फिर उन की आँखों से तेरी गिरी सलाम-अलैक
मिर्ज़ा ज़हीरुद्दीन अज़फ़री
ग़ज़ल
बू-ए-गुल पत्तों में छुपती फिर रही थी देर से
ना-गहाँ शाख़ों में इक दस्त-ए-सबा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
समस्त
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ग़ज़ल
ये रंग-ओ-बू के तिलिस्मात किस लिए हैं 'सुरूर'
बहार क्या है जुनूँ की जो परवरिश ही नहीं