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क़िस्सा
“इस्मत चुग़्ताई! तुम लखनऊ से मेरे लिए दो चीज़ें लाना मत भूलना। एक तो कुरते दूसरे मजाज़।”...
असरार-उल-हक़ मजाज़
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aaftaab ne girebaan-e-mashriq chaak kiyaa
आफ़ताब ने गिरेबान-ए-मशरिक़ चाक किया آفتاب نے گریبان مشرق چاک کیا
सूर्य निकल आया
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ग़ज़ल
गुलशन के गुल हैं चाक-ए-गरेबाँ तिरे बग़ैर
उजड़ी हुई है बज़्म-ए-गुलिस्ताँ तिरे बग़ैर
असलम बाराबंकवी
ग़ज़ल
कैसे रफ़ू हों चाक-ए-गरेबाँ मैं भी सोचूँ तू भी सोच
अपने अपने दर्द का दरमाँ मैं भी सोचूँ तू भी सोच
असरारुल हक़ असरार
शेर
मुझे चाक-ए-गरेबाँ पर हँसी आई तो है लेकिन
मिरे हँसने पे उन की आँख भरी आई तो क्या होगा
कैफ़ी बिलग्रामी
ग़ज़ल
क़द्र दीवानों की सहरा-ए-जुनूँ गर करता
ख़ार तक बख़िया-गर-ए-चाक-ए-गरेबाँ होता