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ग़ज़ल
कोई ग़ज़ल में ग़ज़ल है ये हज़रत-ए-'वहशत'
ख़याल था कि ग़ज़ल आप ने कही होगी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
किस तरह हुस्न-ए-ज़बाँ की हो तरक़्क़ी 'वहशत'
मैं अगर ख़िदमत-ए-उर्दू-ए-मुअ'ल्ला न करूँ
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
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ग़ज़ल
जफ़ा-ए-दुश्मनाँ और बेवफ़ाई-हा-ए-याराँ से
बहुत ग़म-दीदा हो कर 'वहशत'-ए-आज़ुर्दा-जाँ रोया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
बला की होती है 'वहशत' की भी ग़ज़ल-ख़्वानी
कि इक सुरूर सा होता है अहल-ए-महफ़िल को
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
'वहशत' को रहा उन्स जो यूँ फ़न्न-ए-सुख़न से
ये शाख़-ए-हुनर फूलती-फलती ही रहेगी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
अब तसव्वुर में कहाँ शक्ल-ए-तमन्ना 'वहशत'
जिस को मुद्दत से न देखा हो वो क्या याद रहे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
शेर
किस तरह हुस्न-ए-ज़बाँ की हो तरक़्क़ी 'वहशत'
मैं अगर ख़िदमत-ए-उर्दू-ए-मुअ'ल्ला न करूँ
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
हवा है शौक़-ए-सुख़न दिल में मौज-ज़न 'वहशत'
कि हम-सफ़ीर मिरा रो'ब सा सुख़न-दाँ है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
मैं न भूलूँ ग़म-ए-इश्क़ का एहसाँ 'वहशत'
उन को पैमान-ए-मोहब्बत जो नहीं याद न हो
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
बला हैं शाहिदान-ए-शहर 'वहशत' मय-परस्ती में
हुआ मैं उन की सोहबत में ख़राब आहिस्ता आहिस्ता
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
मुतरिब-ए-ख़ुल्द क्या सुनाए वहशत-ए-ख़स्ता क्या सुने
मो'तक़िद-ए-क़दीम है ज़मज़मा हिजाज़ का
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
'वहशत' इस मिस्रा-ए-जुरअत ने मुझे मस्त किया
कुछ तो भाया है कि अब कुछ नहीं भाता है मुझे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
अभी होते अगर दुनिया में 'दाग़'-ए-देहलवी ज़िंदा
तो वो सब को बता देते है 'वहशत' की ज़बाँ कैसी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
क़ुर्बान जाऊँ छोड़ तकल्लुफ़ की गुफ़्तुगू
कह कर पुकार 'वहशत'-ए-शोरीदा-सर मुझे