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ग़ज़ल
ज़ुल्फ़ ओ ख़त देख तिरे रुख़ पे न क्यूँ हैराँ हों
चश्मा-ए-महर में हैं सुम्बुल-ओ-रैहाँ पैदा
शाह नसीर
ग़ज़ल
साफ़-दिल बहर-ए-जहाँ में नहीं रखते दौलत
चश्मा-ए-महर से कब गौहर-ए-ग़लताँ निकला
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी
ग़ज़ल
पौ फटते ही रियाज़-ए-जहाँ ख़ुल्द बन गया
ग़िल्मान-ए-महर साथ लिए आई हूर-ए-सुब्ह
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
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zahr-e-chashm
ज़हर-ए-चश्म زَہْرِ چَشْم
क्रोध या ग़ुस्सा जो नज़रों से दिखाई दे, क्रोधित दृष्टि, ग़ुस्से वाली नज़र
maahir-e-amraaz-e-chashm
माहिर-ए-अमराज़-ए-चश्म ماہِرِ اَمْراضِ چَشْم
आंखों के विकारों और रोगों के अध्ययन और उपचार से संबंधित चिकित्सा की शाखा का विशेषज्ञ नेत्र-विशेषज्ञ, नेत्र चिकित्सक, नेत्र विज्ञानी
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शेर
पौ फटते ही 'रियाज़' जहाँ ख़ुल्द बन गया
ग़िल्मान-ए-महर साथ लिए आई हूर-ए-सुब्ह
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
बे-पर्दा आज निकलेगा पर्दा-नशीं मिरा
कर दे ये कोई महर-ए-मुनव्वर को इत्तिलाअ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
नज़्म
मावरा
तेरा चेहरा है कि तख़्लीक़-ए-मह-ओ-महर का राज़
तेरी आँखें हैं कि असरार-ए-दो-आलम जैसे
प्रेम वारबर्टनी
ग़ज़ल
समझा मैं ख़िज़्र-ए-चश्मा-ए-आब-ए-हयात हूँ
होंठों से मेरे उस ने जो अपने मिलाए होंठ
असद अली ख़ान क़लक़
नज़्म
क़तरा-ए-शबनम
अल-ग़रज़ बालीदगी पौदों की तेरा काम है
चश्मा-ए-आब-ए-ख़िज़र तेरी तरी का नाम है
हामिद हसन क़ादरी
नज़्म
डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
आसमान-ए-इल्म का था इक दरख़्शाँ आफ़्ताब
चश्मा-ए-नूर-ओ-ज़िया था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
चरख़ चिन्योटी
नज़्म
जामिआ-उस्मानिया
तेरे सीने में है मुज़्तर जुम्बिश-ए-मौज-ए-ख़याल
चश्मा-ए-बख़शिश है तेरा चश्मा-ए-आब-ए-हयात
मयकश अकबराबादी
ग़ज़ल
होवे इक क़तरा जो ज़हराब-ए-मोहब्बत का नसीब
ख़िज़्र फिर तो चश्मा-ए-आब-ए-बक़ा क्या चीज़ है