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ग़ज़ल
बीन हवा के हाथों में है लहरे जादू वाले हैं
चंदन से चिकने शानों पर मचल उठे दो काले हैं
अमीक़ हनफ़ी
नज़्म
मैं नशे में हूँ
तुम क्यूँ उखाड़ते हो वो मुर्दे जो हैं गड़े
देखे नहीं हैं तुम ने जो चिकने थे वो घड़े
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
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हिंदी ग़ज़ल
न कुछ भी धूल धक्कड़ हो तो पथ कैसे चला जाए
कहा है चिकने पत्थर पर क़दम जा कर फिसलता है
त्रिलोचन
नज़्म
आज-कल
इन के लिए ज़माने में कोई भी ग़म नहीं
चिकने घड़े हैं ये इन्हें कोई अलम नहीं
प्रवाना रुदौलवी
ग़ज़ल
मथुरा के पेड़ों से कूल्हे चिकने चिकने से गोरे
रूप निर्त के जागे जागे छतियों की थिरकन के बीच
अहसन अहमद अश्क
ग़ज़ल
हुनर हाथों से चिकने का बचा कर ले गया मुझ को
भरोसे पाँव के रहता तो मैं मा'ज़ूर हो जाता
फ़ानी जोधपूरी
ग़ज़ल
चिकने-मुकने आँगन माँगें रोज़ दुआएँ परिंदों की
कभी तो उन की दुआ सुनो और भरी कुंडाली भेजो नाँ
