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ग़ज़ल
न जाने 'शाद' उन का क़र्ज़ मैं कैसे चुकाऊँगा
मिरे भी नाम कुछ लम्हे हिसाबों से निकल आए
ख़ुशबीर सिंह शाद
ग़ज़ल
मैं तेरा क़र्ज़ चुकाऊँगा वस्ल की रुत में
तू अपने अश्कों का रखना हिसाब मेरे लिए
शहबाज़ नदीम ज़ियाई
ग़ज़ल
सब के हुक़ूक़ कुछ न कुछ हैं क़र्ज़ मेरी ज़ात पर
कैसे चुकाऊँगा वहाँ इतने उधार हो गए
एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी
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ग़ज़ल
चाहे बिक जाऊँ चुकाऊँगा मगर सब का हिसाब
मुझ पे क़र्ज़ इमरोज़ का है मुझ पे हक़ फ़र्दा का है