aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "chuke"
यूनाइटेड चौक अनार कली, लाहोर
पर्काशक
तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हमठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम
हम घूम चुके बस्ती बन मेंइक आस की फाँस लिए मन में
यहाँ के लोग कब के जा चुके हैंसफ़र जादा-ब-जादा कर लिया क्या
आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए
स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के सदस्य। ' इंक़िलाब ज़िन्दाबाद ' का नारा दिया। कृष्ण भक्त , अपनी ग़ज़ल ' चुपके चुपके, रात दिन आँसू बहाना याद है ' के लिए प्रसिद्ध।
नेक इरादों के साथ किसी की ख़ुशी, किसी की भलाई के लिए कुछ करना, वो ख़ूबी है जो कम लोगों में होती है, यूँ तो एहसास जताने वाले हज़ारों होते हैं। किसी के एहसास को याद रखना और उस याद को लफ़्ज़ देना हुस्न और इश्क़ दोनों के लिए आज़माइश की घड़ी होती है। एहसास शायरी के इस गुलदस्ते में आपके लिए बहुत कुछ मौजूद हैः
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भूलेبُھولے
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Mulazimat Se Sabakdosh Ho Chuke! Ab Aainda Kya?
महिलाओं द्वारा अनुदित
Chuhe Ke Khutoot Billi Ke Naam
सईद सोहरवर्दी
हास्य-व्यंग
Chori Chhupe
हाजरा मसरूर
महिलाओं की रचनाएँ
Chori Chori Chupke Chupke
रज़ा अली आबिदी
नज़्म
Phool Kuchh Maine Chune Hain
सय्यद शाह नूरुल्लाह क़ादरी नक़्शबंदी
आत्मकथा
Chaak-e-Gireban
आग़ा बाबर
देख चुका मैं मौज मौज
क़ासिम याक़ूब
काव्य संग्रह
Qissa Bhool Chook
विलियम शेक्सपियर
नाटक / ड्रामा
Chhuk-Chhuk-Chhak
विनीता कृष्णा
प्रथम बुक्स
Chupke Se Bahar Aajaye
सलमा कँवल
नॉवेल / उपन्यास
Chupe Chori
अफ़साना
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मौलाना वहीदुद्दीन ख़ाँ
धार्मिक आंदोलन
Naranjee Chuze Sair Ko Chale
मोहम्मद अब्दुल ग़फ़ूर
कहानी
Dekh Lena Ki Chune Jayenge Deewar Mein Hum
जमाल ज़ुबेरी
An Chuwe Sapne
अंजुमन नजमी
अपना ये हाल कि जी हार चुके लुट भी चुकेऔर मोहब्बत वही अंदाज़ पुराने माँगे
तुम भूल कर भी याद नहीं करते हो कभीहम तो तुम्हारी याद में सब कुछ भुला चुके
इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वाआदमी काम का नहीं होता
एक दिन आप की बरहम-निगही देख चुकेरोज़ इक ताज़ा क़यामत हो ज़रूरी तो नहीं
होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हमबज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके
राख के ढेर पे अब रात बसर करनी हैजल चुके हैं मिरे ख़ेमे मिरे ख़्वाबों की तरह
होश ओ हवास ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुकेअब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया
तर्क कर चुके क़ासिद कू-ए-ना-मुरादाँ कोकौन अब ख़बर लावे शहर-ए-आश्नाई की
जो हालतों का दौर था वो तो गुज़र गयादिल को जला चुके हैं सो अब घर जलाइए
क्यूँकर छुपे न माह-ए-दो-हफ़्ता हिजाब सेचौदा तबक़ में नूर है उस आफ़्ताब से
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