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ग़ज़ल
ज़ख़्म-ए-दिल जुर्म नहीं तोड़ भी दे मोहर-ए-सुकूत
जो तुझे जानते हैं उन से छुपाता क्या है
शहज़ाद अहमद
ग़ज़ल
एक मलाल की गर्द समेटे मैं ने ख़ुद को पार किया
कैसे कैसे वस्ल गुज़ारे हिज्र का ज़ख़्म छुपाने में
अज़्म बहज़ाद
नज़्म
आदमी-नामा
पढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ियाँ
और आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँ
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
शीशों का मसीहा कोई नहीं
यूँ टुकड़े टुकड़े हों तो फ़क़त
चुभते हैं लहू रुलवाते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मरहूम और महरूम
हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के
मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते
ज़ुबैर अली ताबिश
ग़ज़ल
इन पुतलियों का क़र्ज़ चुकाता हूँ क्या करूँ
बस दिल से दिल मिलाता हूँ जब देखता हूँ मैं
शाहीन अब्बास
ग़ज़ल
कहा कि रूठे हो क्यूँ हम से क्या सबब इस का
कहा सबब है यही तुम जो दिल छुपाते हो''