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ग़ज़ल
कल तक नारा आज़ादी का जिन के होंटों की ज़ीनत था
वो इत्मीनान से बैठे हैं अब ख़ुद दाम-ए-सय्याद तले
नदीम सिरसीवी
ग़ज़ल
दाम-ए-सय्याद में आज़ाद रहा शिकवा-ए-ग़म
मैं गिरफ़्तार था लेकिन ये गिरफ़्तार न था
बिस्मिल इलाहाबादी
ग़ज़ल
मेरी हमदर्दी है बुलबुल को बचाना या-रब
दाम-ए-सय्याद लिए सू-ए-चमन जाते हैं
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर देहलवी
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shajar-e-saaya-daar
शजर-ए-साया-दार شَجَرِ سایَہ دار
छाओं वाला पेड़, मुशफ़िक़, मेहरबान, छाया देने वाला वृक्ष
aadam-e-be-saaya
आदम-ए-बे-साया آدَمِ بے سایَہ
(लाक्षणिक) पैग़म्बर मोहम्मद साहब जिनके पवित्र शरीर की छाया ज़मीन या किसी चीज़ पर नहीँ पड़ती थी, प्रायाः अद्वितीय के अर्थ में प्रयुक्त
sayyad-e-aulaad-e-aadam
सय्यद-ए-औलाद-ए-आदम سَیَّدِ اَولادِ آدَم
इंसानों के सरदार; पैग़ंबर मुहम्मद का उपाधि
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ग़ज़ल
नुक्ता-ए-वस्ल दम-ए-अर्ज़ क़लम पर रक्खे
बोसा चाहे तो लब-ए-शौक़ ज़बानी माँगे
सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़
ग़ज़ल
देखूँ जो कभी आओ सू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ
जी उठते हैं मुर्दे दम-ए-रफ़्तार कहाँ तक
सययद हुमायु मिर्ज़ा हक़ीर
ग़ज़ल
वो तलव्वुन-ए-दम-ए-होश था कभी कुछ बने कभी कुछ बने
ये जुनून-ए-इश्क़ की शान है जो बना दिया सो बना दिया
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
ज़बाँ पे उस की है हर दम मिरी बला आए
बला भी आए तो समझो बला नहीं आई
सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
जब्र से ज़ुल्म से हम डर नहीं सकते हरगिज़
सा'अत-ए-जेहद में शो'लों की तरह जलते हैं
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर उस के लबों पर हँसी रही लेकिन
दम-ए-विदाअ' वो दर-पर्दा बे-क़रार भी था
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
जब हो दम-ए-आख़िर तो बचा लेने की ताक़त
फिर ख़ाक-ए-शिफ़ा में न कहीं आब-ए-बक़ा में