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नज़्म
ख़ुद-कुशी
आओ ना हम भी तोड़ दें इस दाम-ए-ज़ीस्त को
संग-ए-अजल पे फोड़ दें इस जाम-ए-ज़ीस्त को
मजीद अमजद
ग़ज़ल
ता-दम-ए-ज़ीस्त रहा यार-ए-परी-रू तस्ख़ीर
हर्फ़-ए-ख़ातम हुए हम नक़्श-ए-सुलैमाँ हो कर
मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता
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taa-dam-e-ziist
ता-दम-ए-ज़ीस्त تا دَمِ زِیسْت
जब तक आखिरी साँस है तब तक, अर्थात, उम्र भर, जीवनभर, जीते जी
dar kaar-e-KHair haajat-e-istiKHaara niist
दर कार-ए-ख़ैर हाजत-ए-इस्तिख़ारा नीस्त درکارِ خیر حاجتِ استخارہ نیست
dar kaar-e-KHair haajat-e-hech-istiKHaara niist
दर कार-ए-ख़ैर हाजत-ए-हेच-इस्तिख़ारा नीस्त دَر کارِ خَیر حاجَتِ ہیچ اِستِخارَہ نِیسْت
अच्छे काम में सोच बिचार कैसा, भलाई करते समय परिणाम पर ध्यान होना चाहिए
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ग़ज़ल
पोशीदा लफ़्ज़ लफ़्ज़ में है दास्तान-ए-कर्ब
'क़ुदसी' किताब-ए-ज़ीस्त का हर बाब देखना
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
जब्र से ज़ुल्म से हम डर नहीं सकते हरगिज़
सा'अत-ए-जेहद में शो'लों की तरह जलते हैं
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
जब हो दम-ए-आख़िर तो बचा लेने की ताक़त
फिर ख़ाक-ए-शिफ़ा में न कहीं आब-ए-बक़ा में
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर उस के लबों पर हँसी रही लेकिन
दम-ए-विदाअ' वो दर-पर्दा बे-क़रार भी था
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
हुआ है अबरू-ए-जानाँ से दिल-ए-बेताब सद-पारा
मुक़ाबिल हो नहीं सकता दम-ए-शमशीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
एहतिसाब-ए-ज़ीस्त करने के लिए बैठा था मैं
याद आई दोस्तों की कार-फ़रमाई बहुत
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
वक़्त के नादाँ परिंदे ज़ोम-ए-दानाई के गिर्द
ख़ूब-सूरत ख़्वाहिशों के दाम ले कर आए हैं