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ग़ज़ल
ग़म-ए-दौराँ की रही या ग़म-ए-जानाँ की रही
अल-ग़रज़ छेड़ रही मंज़िल-ए-नाकाम के साथ
मंज़िल लोहाठेरी
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नज़्म
फ़सील-ए-शब
दामन-ए-दिल पे ग़ुबार-ए-रह-ए-मंज़िल है अभी
पा-ए-अफ़्कार में देरीना सलासिल है अभी
क़ैसर-उल जाफ़री
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
अपने ही नक़्श-ए-क़दम संग-ए-निशान-ए-मंज़िल
अपने ही दम से बसीरत है ये बीनाई है
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
सुलाये रक्खा हमें भी फ़रेब-ए-मंज़िल ने
चले थे हम भी किसी हम-रकाब-ए-ख़्वाब के साथ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
हम राह-रव-ए-मंज़िल दुश्वार रहे हैं
हर तरह मुसीबत में गिरफ़्तार रहे हैं