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ग़ज़ल
ऐसी हवा बही कि है चारों तरफ़ फ़साद
जुज़ साया-ए-ख़ुदा कहीं दार-उल-अमाँ नहीं
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
यक दस्त-ए-फ़ितना बरपा हम ने जहाँ में देखा
मंसूर को सरासर दारुल-अमाँ में देखा
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
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ग़ज़ल
हमारी सख़्त-जानी से हुआ शल हाथ क़ातिल का
सर-ए-मक़्तल ही हम ने कर लिया दार-उल-अमाँ पैदा
मयकश अकबराबादी
ग़ज़ल
मज़े में उम्र कटती है कोई शर है न फ़ित्ना है
हमें तो मै-कदा दार-उल-अमाँ मालूम होता है
इशरत सफ़ी पुरी
नज़्म
पास्बान-ए-उर्दू
इसे ज़माना-शनासी तेरी न हम कहेंगे तो क्या कहेंगे
बना दिया 'सैफ़िया' को तू ने जो एक दारुल-अमान-ए-उर्दू
रहबर जौनपूरी
नज़्म
मस्जिद-ए-अहमरीं
दरून-ए-मस्जिद खड़े मनारे अज़ान देते
तो वादी-ए-इश्क़ से तुलूअ' नमाज़ होती
