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ग़ज़ल
एक जल्वे की हवस वो दम-ए-रेहलत भी नहीं
कुछ मोहब्बत नहीं ज़ालिम तो मुरव्वत भी नहीं
आसी ग़ाज़ीपुरी
ग़ज़ल
दुहाई है ग़म-ए-मजबूरी-ए-इम्काँ दुहाई है
कि फिरती हैं दम-ए-रेहलत हमारी पुतलियाँ हम से
अफ़क़र मोहानी
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नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
बारिश-ए-संग-ए-अलम अपना मुक़द्दर ठहरी
राहत-ए-दर्द मिली लुत्फ़-ओ-करम के बदले
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
जब हो दम-ए-आख़िर तो बचा लेने की ताक़त
फिर ख़ाक-ए-शिफ़ा में न कहीं आब-ए-बक़ा में
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ब-ज़ाहिर उस के लबों पर हँसी रही लेकिन
दम-ए-विदाअ' वो दर-पर्दा बे-क़रार भी था
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
हुआ है अबरू-ए-जानाँ से दिल-ए-बेताब सद-पारा
मुक़ाबिल हो नहीं सकता दम-ए-शमशीर से काग़ज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
वक़्त के नादाँ परिंदे ज़ोम-ए-दानाई के गिर्द
ख़ूब-सूरत ख़्वाहिशों के दाम ले कर आए हैं