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ग़ज़ल
उस से दरयाफ़्त न करना कभी दिन के हालात
सुब्ह का भूला जो लौट आया हो घर शाम के बाद
कृष्ण बिहारी नूर
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विषय
दरख़्त
दरख़्त शायरी
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ग़ज़ल
रख हाथ दिल पर 'मीर' के दरयाफ़्त कर क्या हाल है
रहता है अक्सर ये जवाँ कुछ इन दिनों बेताब सा
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
अज़ीज़ नबील
नज़्म
अभी कुछ दिन लगेंगे
किसी के शहर को दरयाफ़्त करने में
किसी अनमोल साअत में किसी नाराज़ साथी को ज़रा सा पास लाने में
असग़र नदीम सय्यद
ग़ज़ल
रो रहे हैं दोस्त मेरी लाश पर बे-इख़्तियार
ये नहीं दरयाफ़्त करते किस ने इस की जान ली
