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ग़ज़ल
कैसे दिल लगता हरम में दौर-ए-पैमाना न था
इस लिए फिर आए का'बे से कि मय-ख़ाना न था
मुज़्तर ख़ैराबादी
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ग़ज़ल
हवा-ए-फ़स्ल-ए-गुल आई घटा घनघोर जब छाई
चला यूँ दौर-ए-पैमाना कि मयख़ाने मचल उट्ठे
हामिद-उल-अंसारी अंजुम
ग़ज़ल
वो मुझे देखा करें और मैं उन्हें देखा करूँ
लुत्फ़ इसी में है कि यूँ ही दौर-ए-पैमाना रहे
विशनू कुमार शाैक़
नज़्म
ख़्वाबों ख़यालों की अप्सरा
मगर वतन भी छुटा 'दौर' दिल की दिल में रही
ये बम्बई भी न हो ख़्वाब-ए-दीगराँ की तरह