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ग़ज़ल
आओ फिर गर्मी दयार-ए-इश्क़ में पैदा करें
तूर की मिट्टी से तख़लीक़-ए-यद-ए-बैज़ा करें
सीमाब अकबराबादी
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शेर
दयार-ए-इश्क़ में तन्हा रहा नहीं हरगिज़
ख़ुशी ने हाथ जो छोड़ा तो ग़म ने थाम लिया
अनीसा हारून शिरवानिया
नज़्म
जावेद के नाम
दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा कर
नया ज़माना नए सुब्ह ओ शाम पैदा कर
अल्लामा इक़बाल
शेर
दयार-ए-इश्क़ आया कुफ़्र-ओ-ईमाँ की हदें छूटीं
यहीं से और पैदा कर ख़ुदा ओ अहरमन कोई
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
दयार-ए-इश्क़ में आशुफ़्ता-कार हम भी हैं
ज़े-फ़र्क़-ता-ब-क़दम शो'ला-ज़ार हम भी हैं
शाइर फ़तेहपुरी
ग़ज़ल
दयार-ए-इश्क़ में ऐसे भी हैं मक़ाम बहुत
जहाँ जुनून का होता है एहतिराम बहुत