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aa.iina-e-dil par gard-e-malaal honaa
आईना-ए-दिल पर गर्द-ए-मलाल होना آئینۂ دل پر گردِ ملال ہونا
रंजिश होना, दुखी होना
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ग़ज़ल
दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यादों से उलझता छोड़ देते हैं
हम इस वहशी को जंगल में अकेला छोड़ देते हैं
असलम कोलसरी
नज़्म
दिल-ए-पुर-ख़ूँ
दिल बहुत दुखता है हर बात पे दिल दुखता है
सुब्ह-ए-नौ-ख़ेज़ पे सूरज की जहाँबानी पे
इकराम ख़ावर
ग़ज़ल
क्या दिल दुखाओगे जो मज़ा दर्द का नहीं
दम भर तो बैठो आ के दिल-ए-पुर-मलाल में
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
शेर
दिल-ए-पुर-शौक़ की क़िस्मत में लिखी है नाकामी
ये इक नाज़ुक सी शय क्यों इस तरह ठुकराई जाती है
अख़्तर अंसारी
नज़्म
मुझे वापस कर दे
दिल-ए-पुर-शौक़ की दौलत मुझे वापस कर दे
मेरी पहली सी तबीअत मुझे वापस कर दे