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शेर
मेरे दिल-ए-शिकस्ता को कहती है देख ख़ल्क़
क्या ज़ोर-ए-आईना है ये होवे अगर दुरुस्त
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
इम्तियाज़ ख़ान
ग़ज़ल
रुस्वाइयों के ख़ौफ़ से उठता नहीं मैं 'दिल'
ऐ काश दिल को रखता किसी बंदिशों में दोस्त
दिल सिकन्दरपुरी
ग़ज़ल
मैं ख़ुद से एक भी लम्हा बरी नहीं होता
दिल-ओ-दिमाग़ को बाँधे है इल्तिफ़ात की डोर