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ग़ज़ल
असर-ए-आह-ए-दिल-ए-ज़ार की अफ़्वाहें हैं
या'नी मुझ पर करम यार की अफ़्वाहें हैं
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
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ग़ज़ल
किस क़दर ज़ख़्म-ए-दिल-ए-ज़ार ने खाए हैं अभी
लाफ़-ज़न मिल के मिरे यार से आए हैं अभी
मसूद क़ुरैशी
ग़ज़ल
दोस्तो हाल-ए-दिल-ए-ज़ार ज़रा उस से कहो
कम न हो इस में ज़रा बल्कि सिवा उस से कहो
किशन कुमार वक़ार
ग़ज़ल
क़ाबिल-ए-शरह मिरा हाल-ए-दिल-ए-ज़ार न था
सुनने वाले तो बहुत थे कोई ग़म-ख़्वार न था
बिस्मिल इलाहाबादी
ग़ज़ल
कई दिन सुलूक-ए-विदा' का मिरे दरपय-ए-दिल-ए-ज़ार था
कभू दर्द था कभू दाग़ था कभू ज़ख़्म था कभू वार था
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
कब है मंज़ूर कि यूँ जिंस-ए-दिल-ए-ज़ार बिके
पर ये वो शय है न बेचूँ भी तो सौ बार बिके