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ग़ज़ल
ज़हे क़िस्मत अगर तुम को हमारा दिल पसंद आया
मगर ये दाग़ क्यूँ कर ऐ मह-ए-कामिल पसंद आया
तिलोकचंद महरूम
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shaah pasand daal
शाह पसंद दाल شاہ پَسَنْد دال
दिनचर्या से अधिक असाधारणीय धनिक जनों के खाने के योग्य पकाई हुई दाल
baadshaah-pasand daal
बादशाह-पसंद दाल بادشاہ پَسَند دال
मूँग की धोई दाल जिसमें बहुत सी हरी मिर्चें डाल कर पकाते हैं
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ग़ज़ल
फ़ज़ा-ए-ख़ंदा-ए-गुल तंग ओ ज़ौक़-ए-ऐश बे-परवा
फ़राग़त-गाह-ए-आग़ोश-ए-विदा'-ए-दिल-पसंद आया
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दिल-पसंद-ए-निगह-ए-नाज़-ए-बुताँ है 'तौफ़ीक़'
ऐन बुत-ख़ाने में का'बे ने जगह पाई है
ताैफ़ीक़ हैदराबादी
नज़्म
बिंत-ए-माहताब
तिरी ज़बान की जुम्बिश में सैंकड़ों नग़्मात
वो दिल-पसंद ख़साइल वो दिल-नशीं आदात
सरताज आलम आबिदी
ग़ज़ल
शुमार-ए-सुब्हा मर्ग़ूब-ए-बुत-ए-मुश्किल-पसंद आया
तमाशा-ए-ब-यक-कफ़ बुर्दन-ए-सद-दिल-पसंद आया
मिर्ज़ा ग़ालिब
उद्धरण
बादशाहों और मुतलक़-उल-अनान हुकमुरानों की मुस्तक़िल और दिल-पसंद सवारी दर-हक़ीक़त रिआ'या होती है।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
यूँ तो सब मिस्री की डलियाँ हैं मगर 'ऐश' सुना
दिल-पसंद अपने हैं इक 'मीर' के अश’आर फ़क़त