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नज़्म
दीवाली
हम तवज्जोह दिल की दुनिया की तरफ़ देते नहीं
प्यार के दो बोल मीठे बोलना चाहें तो क्यों
प्रेम पाल अश्क
हास्य
मुख़्तसर सी रस्म-ए-ख़तना और उस पर तीस शे'र
अक़्द के दो बोल की तक़रीब और चालीस शे'र
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
पनह-ख़्वाहों के मरकज़ में सानेहा
अभी मैं उस को अपना जान कर दो बोल हमदर्दी के बोलूँगा
मगर ये सोच कर मैं डर गया
जमशेद मसरूर
ग़ज़ल
दो बोल दिल के हैं जो हर इक दिल को छू सकें
ऐ 'अश्क' वर्ना शेर हैं क्या शाइरी है क्या
इब्राहीम अश्क
ग़ज़ल
फ़क़त दो-बोल ही चाहत के दुनिया की ज़रूरत हैं
मैं लोगों के दिलों में ये मसर्रत बाँट देता हूँ
सईद इक़बाल सादी
ग़ज़ल
मैं तो इस शख़्स से कहता रहा हर बार 'नबील'
मुझ को दो बोल मोहब्बत के सुना कर ले जाए
