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ग़ज़ल
जीते-जी दुख सुख के लम्हे आते जाते रहते हैं
हम तो ज़रा सी बात पे पहरों अश्क बहाते रहते हैं
अख़तर इमाम रिज़वी
शेर
कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
राजेन्द्र मनचंदा बानी
समस्त