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ग़ज़ल
अदू-ए-दीन-ओ-ईमाँ दुश्मन-ए-अम्न-ओ-अमाँ निकले
तिरे पैकाँ बड़े जाबिर बड़े ना-मेहरबाँ निकले
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
ग़ज़ल
ये तेरी बे-ज़री और हासिदों का ये हसद तौबा
अगर ऐ 'अम्न' तेरे पास ज़र होता तो क्या होता
अम्न लख़नवी
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नज़्म
सरहद-ए-हिन्दोस्तान
जारहिय्यत चीन की अब हो गई सब पर अयाँ
सारी दुनिया कह उठी है दुश्मन-ए-अम्न-ओ-अमाँ
तकमील रिज़वी लखनवी
ग़ज़ल
दुश्मन-ए-दीं दुश्मन-ए-जाँ दुश्मन-ए-अम्न-ओ-सुकूँ
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे हो गए
गुलज़ार देहलवी
नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
खड़ा है हौसला-ए-अम्न-ओ-आश्ती ले कर
न कोई ख़ोद बदन पर न हाथ में शमशीर
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
गाँधी जी
सदाक़तों के परस्तार झूट के दुश्मन
निज़ाम-ए-अम्न के रूह-ए-रवाँ थे गाँधी जी
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
ग़ज़ल
तिरे तेवर बदलते ही ज़माना हो गया दुश्मन
हिलाल-ए-ईद भी ज़ाहिर हुआ शमशीर की सूरत
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ऐसी बस्ती में मियाँ अम्न-ओ-अमाँ का क्या सवाल
सुल्ह-जू कम हों जहाँ पर और बलवाई बहुत