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ग़ज़ल
दिखावे के लिए एलान-ए-फ़ैज़-ए-आम होता है
मगर इक ख़ास ही हल्क़ा में दौर-ए-जाम होता है
जुर्म मुहम्मदाबादी
ग़ज़ल
हुस्न को आख़िर ख़याल-ए-फ़ैज़-ए-आम आ ही गया
आज कोई ख़ुद-बख़ुद बाला-ए-बाम आ ही गया
साहिर सियालकोटी
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नज़्म
सब जानते हैं इल्म से है ज़िंदगी की रूह
रहम आ गया हुज़ूर को हालत पे क़ौम की
फिर क्या था मौजज़न हुआ दरिया-ए-फ़ैज़-ए-आम
अकबर इलाहाबादी
शेर
पैग़ाम-ए-लुत्फ़-ए-ख़ास सुनाना बसंत का
दरिया-ए-फ़ैज़-ए-आम बहाना बसंत का
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
ग़ज़ल
पैग़ाम-ए-लुत्फ़-ए-ख़ास सुनाना बसंत का
दरिया-ए-फ़ैज़-ए-आम बहाना बसंत का
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
नज़्म
महात्मा-गाँधी का क़त्ल
यकसाँ नज़दीक-ओ-दूर पे था बारान-ए-फ़ैज़-ए-आम तिरा
हर दश्त-ओ-चमन हर कोह-ओ-दमन में गूँजा है पैग़ाम तिरा
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
देखा गया न मुझ से मआनी का क़त्ल-ए-आम
चुप-चाप मैं ही लफ़्ज़ों के लश्कर से कट गया

