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नज़्म
काश
मुझ में ऐ यार मिरे कोई कमालात न देख
मैं तो इस दहर का छोटा सा बशर हूँ जिस ने
विनोद कुमार त्रिपाठी बशर
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नज़्म
रेहन-ए-ज़मन
मिरे म'आश पे होते तो हैं असर-अंदाज़
कि मैं भी फ़र्द-ए-बशर हूँ मुझे भी जीना है
कृष्ण मोहन
हास्य
हर जगह चोरी का चर्चा हर जगह है लूट-मार
दिन-दहाड़े लुट रहा है हर तरफ़ फ़र्द-ए-बशर
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
जूते चोर
हर जगह चोरी का चर्चा हर जगह है लूट-मार
दिन-दहाड़े लुट रहा है हर तरफ़ फ़र्द-ए-बशर
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
शेर
हर जगह चोरी का चर्चा हर जगह है लूट-मार
दिन-दहाड़े लुट रहा है हर तरफ़ फ़र्द-ए-बशर
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
ग़ज़ल
दिल किसी फ़र्द-ए-बशर का ख़ाली इस ग़म से नहीं
ग़म ये शाए कू-ब-कू ख़ाना-ब-ख़ाना हो गया
हकीम आग़ा जान ऐश
ग़ज़ल
इक जुर्म और फ़र्द-ए-जराएम में बढ़ गया
या'नी न दर्द-ए-दिल का हो इज़हार आज-कल