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नज़्म
मैं क्यूँ भूल जाऊँ
वो दिन तफ़रक़ा-ख़ेज़ मजबूरियों का
फ़रेब-ए-मुक़द्दर की वो चीरा-दस्ती
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
है सौ अदाओं से उर्यां फ़रेब-ए-रंग-ए-अना
बरहना होती है लेकिन हिजाब-ए-ख़्वाब के साथ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
ये वक़्त का है तक़ाज़ा कि है फ़रेब-ए-नज़र
कि बेटा बाप के क़द से बड़ा दिखाई दे
बद्र-ए-आलम ख़ाँ आज़मी
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
बारिश-ए-संग-ए-अलम अपना मुक़द्दर ठहरी
राहत-ए-दर्द मिली लुत्फ़-ओ-करम के बदले
नूर-ए-शमा नूर
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ग़ज़ल
फ़रेब-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा बहुत ही 'आरज़ी शय है
रहेंगे 'उम्र भर इस दिल पे चोटों के निशाँ बाक़ी
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
ग़ज़ल
सब पर गुल-ए-रा'ना की तो होती है नवाज़िश
क्या मेरे मुक़द्दर के लिए ख़ार बहुत हैं
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
ग़ज़ल
डूबूँगा गर है मेरे मुक़द्दर में डूबना
ग़व्वास-ए-बहर-ए-इश्क़ को साहिल से क्या ग़रज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
ग़ज़ल
आइने जितने भी देखे वो मुकद्दर थे 'सुरूर'
जौहर-ए-सिद्क़-ओ-सफ़ा फिर भी हमारा न गया
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
मुसलसल था फ़रेब-ए-ख़ाब-गाह-ए-आलम-ए-फ़ानी
मगर सोता रहा चलती रही उम्र-ए-रवाँ मेरी
सीमाब अकबराबादी
ग़ज़ल
अल्लाह रे फ़रेब-ए-नज़र-ए-चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़
बंदा है हर इक शैख़ हर इक बरहमन उन का