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ग़ज़ल
करवटें लेने दो फ़र्श-ए-ख़ाक पर नख़चीर को
बे-धड़क हो कर निकालो तुम जिगर से तीर को
शेर सिंह नाज़ देहलवी
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नज़्म
शा'इरी का जनाज़ा
इक जमूदी कैफ़ियत छाने लगी इदराक पर
'अर्श से गिरता हो जैसे कोई फ़र्श-ए-ख़ाक पर
बर्क़ आशियान्वी
ग़ज़ल
किरन के हक़ में ये सूरज का फ़ैसला क्यूँ है
जो फ़र्श-ए-ख़ाक पुकारे तो दूर हट जाना
सय्यद अमीन अशरफ़
ग़ज़ल
जो लूटते हैं मज़े फ़र्श-ए-गुल के बिस्तर पर
वो फ़र्श-ए-ख़ाक पे सोएँगे इस जहान के बा'द
एम. नसरुल्लाह नसर
ग़ज़ल
ऐसी ही कुछ कशिश है जो हूँ फ़र्श-ए-ख़ाक पर
वर्ना बुलंदियों से भी ऊँचा गया हूँ मैं