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ग़ज़ल
करवटें लेने दो फ़र्श-ए-ख़ाक पर नख़चीर को
बे-धड़क हो कर निकालो तुम जिगर से तीर को
शेर सिंह नाज़ देहलवी
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नज़्म
बरसात की शाम
काम सोने का बना है गुम्बद-ए-अफ़्लाक पर
ज़ौ-फ़गन होता है आलम इस का फ़र्श-ए-ख़ाक पर
बिस्मिल इलाहाबादी
ग़ज़ल
जो लूटते हैं मज़े फ़र्श-ए-गुल के बिस्तर पर
वो फ़र्श-ए-ख़ाक पे सोएँगे इस जहान के बा'द
एम. नसरुल्लाह नसर
ग़ज़ल
ऐसी ही कुछ कशिश है जो हूँ फ़र्श-ए-ख़ाक पर
वर्ना बुलंदियों से भी ऊँचा गया हूँ मैं
आदिल असीर देहलवी
नज़्म
मज़दूर की ज़िंदगी
जल रहा है सब्ज़ा-ए-बे-रंग फ़र्श-ए-ख़ाक पर
भुन रहा है धूप की तेज़ी से गेती का जिगर
शातिर हकीमी
शेर
सर के नीचे ईंट रख कर उम्र भर सोया है तू
आख़िरी बिस्तर भी 'आमिर' तेरा फ़र्श-ए-ख़ाक था
मुहम्मद याक़ूब आमिर
ग़ज़ल
सर के नीचे ईंट रख कर उम्र भर सोया है तू
आख़िरी बिस्तर भी 'आमिर' तेरा फ़र्श-ए-ख़ाक था
मुहम्मद याक़ूब आमिर
नज़्म
नया मकान
ये फ़र्श-ए-ख़ाक था क़ालीन-ए-ज़र-फ़शाँ अपना
ये महर ओ माह ये तारे थे अपने घर के दिए
मख़मूर जालंधरी
ग़ज़ल
रक़्स-ए-ज़मीं को गर्दिश-ए-अफ़्लाक चाहिए
नक़्श-ए-क़दम को फ़र्श-ए-ख़स-ओ-ख़ाक चाहिए
नरजिस अफ़रोज़ ज़ैदी
ग़ज़ल
फ़र्श-ए-ख़ाक अब अहल-ए-मसनद को नहीं होता नसीब
बोरिया-बाफ़ आज ज़ेब-ए-तख़्त-ए-सुल्ताँ हों तो क्या
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
किरन के हक़ में ये सूरज का फ़ैसला क्यूँ है
जो फ़र्श-ए-ख़ाक पुकारे तो दूर हट जाना