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नज़्म
सुब्ह से शाम तक
उस की गर्मी मिरी साँसों से कोई दूर नहीं
फ़र्श-ए-मख़मल पे बिछी जाती हैं उस की नज़रें
ज़िया जालंधरी
नज़्म
ऐ हमराज़
सहर की फूटती किरनें तड़प आई दरीचे से
लिपट कर खेलती हैं मेरे घर के फ़र्श-ए-मख़मल से
सूफ़िया अनजुम ताज
नज़्म
समुंदर का बुलावा
गिरते हैं इक फ़र्श-ए-मख़मल बनाते हैं जिस पर
मिरी आरज़ूओं की परियाँ अजब आन से यूँ रवाँ हैं
मीराजी
ग़ज़ल
नस्ब करें मेहराब-ए-तमन्ना दीदा ओ दिल को फ़र्श करें
सुनते हैं वो कू-ए-वफ़ा में आज करेंगे नुज़ूल मियाँ
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
ये रंग पाश हुए हैं वो आज ऐ 'नादिर'
है फ़र्श-ए-बज़्म-ए-तरब लाला-ज़ार होली में
कल्ब-ए-हुसैन नादिर
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
तजल्ली गर तिरी पस्त ओ बुलंद उन को न दिखलाती
फ़लक यूँ चर्ख़ क्यूँ खाता ज़मीं क्यूँ फ़र्श हो जाती