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ग़ज़ल
मिरी मा'सूमियत तो देख लो फ़र्त-ए-मोहब्बत में
तुम्हारी बे-रुख़ी भी दिल-लगी मा'लूम होती है
बलबीर राठी
ग़ज़ल
कहा करते थे वालिद क़ैस के फ़र्त-ए-मोहब्बत में
नहीं मा'लूम किस जंगल में बर-ख़ुरदार बैठे हैं
ज़रीफ़ लखनवी
ग़ज़ल
अब तो वो फ़र्त-ए-मोहब्बत से ये फ़रमाते हैं
घर न जाएँगे जो होती है सहर होने दो
मुंशी शिव परशाद वहबी
ग़ज़ल
जिस वक़्त तू ने फ़र्त-ए-मोहब्बत में अपना आप
गर्द-ए-रह-ए-तलब में मिटाया तो हम हुए
राव मोहम्मद उमर
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