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ग़ज़ल
बारगाह-ए-हुस्न में ऐ 'बर्क़' फ़र्त-ए-रोब से
याद है अब तक वो अपनी बे-ज़बानी याद है
शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी
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ग़ज़ल
फ़र्त-ए-सोज़-ए-उल्फ़त में देख कर सकूँ दिल का
बिजलियाँ मचलती हैं बादलों के महशर में
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
फ़र्त-ए-हुजूम-ए-ख़ल्क़ से हों बंद रास्ते
वो रश्क-ए-यूसुफ़ आए जो बाज़ार की तरफ़