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ग़ज़ल
फ़ुर्सत-ए-शब में तेरा ध्यान आ जाता है
कुंज-ए-चमन क्यूँकर घर की दहलीज़ करूँ
ज़ियाउल मुस्तफ़ा तुर्क
ग़ज़ल
निशान-ए-ज़ख़्म पे निश्तर-ज़नी जो होने लगी
लहू में ज़ुल्मत-ए-शब उँगलियाँ भिगोने लगी
बद्र-ए-आलम ख़लिश
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नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
चराग़ राह में उस के अमल से जलने लगे
लो आज सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार आ ही गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
ये तो सच है कि शब-ए-ग़म को सँवारा तुम ने
चश्म-ए-तर ने भी मिरा साथ निभाया है बहुत
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
सारे दिन करते हैं हम दश्त-ए-तमन्ना का सफ़र
गर्द चेहरे पे लिए शाम को घर आते हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
शब-ए-फ़िराक़ की ज़ुल्मत में ग़म के मारों का
तिरे ख़याल की ताबिंदगी ने साथ दिया