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ग़ज़ल
गर्दिश-ए-जाम भी है गर्दिश-ए-अय्याम के साथ
ज़िंदगी रक़्स में है साक़ी-ए-गुलफ़ाम के साथ
ज़ाकिर मुहिब
ग़ज़ल
गर्दिश-ए-जाम भी है रक़्स भी है साज़ भी है
जिस में नग़्मों का तलातुम है वो आवाज़ भी है
राम कृष्ण मुज़्तर
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jaa-e-gardish
जा-ए-गर्दिश جائے گَرْدِش
चक्कर लगाने की जगह
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ग़ज़ल
बार बार उठना सर-ए-महफ़िल निगाह-ए-नाज़ का
गर्दिश-ए-जाम-ए-शराब-ए-अर्ग़वानी याद है
शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी
ग़ज़ल
तेरी निगाह-ए-मस्त से मुझ पे ये राज़ खुल गया
और भी गर्दिशें हैं कुछ गर्दिश-ए-जाम के सिवा
हफ़ीज़ होशियारपुरी
ग़ज़ल
तेरी निगाह-ए-मस्त से मुझ पे ये राज़ खुल गया
और भी गर्दिशें हैं कुछ गर्दिश-ए-जाम के सिवा
हफ़ीज़ होशियारपुरी
ग़ज़ल
गर्दिश-ए-जाम तो हो गर्दिश-ए-अय्याम न हो
ये कोई बात हुई सुब्ह तो हो शाम न हो
उमा शंकर शादाँ ग्वालियरी
नज़्म
तलबा-ए-अलीगढ़ कॉलेज के नाम
मौत है ऐश-ए-जावेदाँ ज़ौक़-ए-तलब अगर न हो
गर्दिश-ए-आदमी है और गर्दिश-ए-जाम और है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
हफ़ीज़ जौनपुरी
नज़्म
नामा-ए-जानाँ
वो जो दो चार सुबू-कश थे कि जिन के दम से
गर्दिश-ए-जाम भी थी रौनक़-ए-मय-ख़ाना भी थी
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
कम नहीं मिल्क-ए-सुलेमाँ से विसाल-ए-साक़ी
गर्दिश-ए-जाम मुझे हल्क़ा-ए-ख़ातम हो जाए