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ग़ज़ल
किन मंज़िलों में गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार है
उन का करम भी मेरी तबीअ'त पे बार है
माया खन्ना राजे बरेलवी
नज़्म
दरबार1911
ज़र्रे वीरानों से उठते थे तमाशा देखने
चश्म-ए-हैरत बन गई थी गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार
अकबर इलाहाबादी
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ग़ज़ल
आ और रंग-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार देख
शाम-ए-ख़िज़ाँ है सुब्ह-ए-बहाराँ तिरे बग़ैर
राजा अब्दुल ग़फ़ूर जौहर निज़ामी
ग़ज़ल
जाते जाते देख लेना गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार
ज़िंदगी से बाँकपन लुत्फ़-ए-ख़ता ले जाएगी
आशुफ़्ता चंगेज़ी
ग़ज़ल
ईमा ही था ये चश्म-ए-दिल-आवेज़-ए-यार का
हम रम्ज़-ख़्वान-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार थे
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
शिकार-ए-काकुल-ओ-रुख़ हो चुका दिल-ए-'मैकश'
शिकार-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार क्या होगा
मसूद मैकश मुरादाबादी
नज़्म
इम्तिहान
बंद है कमरे के अंदर गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार
क्या ख़बर आई ख़िज़ाँ कब कब गई फ़स्ल-ए-बहार
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
ग़ज़ल
किस के रोके से रुकी है गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार
ज़ुल्मत-ए-शब के पुजारी सुब्ह के आसार देख
माहिर अब्दुल हई
नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
जो तुझ से अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार रखते हैं
इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार रखते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
सौदा हुआ है जिस को रुख़-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार का
क्या ख़ौफ़ उस को गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार का