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ग़ज़ल
निगाह-ए-बादा-गूँ यूँ तो तिरी बातों का क्या कहना
तिरी हर बात लेकिन एहतियातन छान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
चश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाब
जिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँ
