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ग़ज़ल
पत्थर को माना देवता लेकिन वो पत्थर ही रहा
हम गिड़गिड़ाते ही रहे उस पर असर कोई न था
विपिन सुनेजा शायक़
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नज़्म
सरहद-पार का एक ख़त पढ़ कर
कोई फ़क़ीर खड़ा गिड़गिड़ा रहा था अभी
बिना उठे उसे धुत्कार कर भगा भी चुका
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
जब गुदगुदाते हैं तुझे हम और ढब से तब
सहते हैं गालियाँ तिरी ना-चार चार पाँच
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
हास्य
वोटरों के हाथ जोड़े ख़ूब हो कर बद-हवास
गिड़गिड़ा कर हर कस-ओ-ना-कस से हो ये इल्तिमास
ज़रीफ़ लखनवी
नज़्म
नन्हा क़ासिद
तिरे क़ासिद के ये अफ़्कार दिल को गुदगुदाते थे
और अपने भोलपन से मेरे जज़्बों को हँसाते थे