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ग़ज़ल
जिन पे बारिश-ए-गुल है उन का हाल क्या होगा
ज़ख़्म खाने वाले भी बाग़ बाग़ हैं यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
बू-ए-गुल पत्तों में छुपती फिर रही थी देर से
ना-गहाँ शाख़ों में इक दस्त-ए-सबा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
उजाले की लकीर
अब के तज़ईन-ए-चमन होगी लहू की सुर्ख़ी
फ़स्ल-ए-गुल अब के नए जल्वे बिखेरेगी यहाँ
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
आरज़ू में तेरी ऐ गुल-पोश शहज़ादी न पूछ
कैसे आलम-ताब सरदारोँ के सर जाते रहे