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ग़ज़ल
जहाँ नब्ज़ें रुकीं दिल सर्द हो दो हिचकियाँ आईं
समझ लीजे कि मंज़िल आ गई गोर-ए-ग़रीबाँ की
मोहम्मद अब्बास सफ़ीर
शेर
सबक़ आ के गोर-ए-ग़रीबाँ से ले लो
ख़मोशी मुदर्रिस है इस अंजुमन में
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
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नज़्म
गोर-ए-ग़रीबाँ
विदा-ए-रोज़-ए-रौशन है गजर शाम-ए-ग़रीबाँ का
चरा-गाहों से पलटे क़ाफ़िले वो बे-ज़बानों के
नज़्म तबातबाई
ग़ज़ल
खींच लाएगी कभी तो कशिश-ए-इश्क़ उन्हें
गुज़र उन का भी सू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ होगा
अब्दुल मजीद ख़्वाजा शैदा
ग़ज़ल
क़दम सँभाल के रख पाएमाल हो न कोई
ज़मीन-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ है फ़र्श-ए-ख़्वाब नहीं
महाराजा सर किशन परसाद शाद
नज़्म
अहमद-'फ़राज़' मरहूम की नज़्र
हवा-ए-तुंद के हाथों से जब्र की मिक़राज़
चराग़-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ की लौ कतरती है
शादाब रज़ी
ग़ज़ल
दिल इस पर आरज़ू आसूदा हो जाता है दुनिया से
कभी गर मंज़र-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ देख लेते हैं
अफ़क़र मोहानी
ग़ज़ल
ले गया था तरफ़-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ दिल-ए-ज़ार
क्या कहें तुम से जो कुछ वाँ का तमाशा देखा
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
ख़ाक अपनी ख़ाक-ए-कूचा-ए-जानाँ में जा मिली
एहसानमंद-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ नहीं हैं हम
अब्र अहसनी गुन्नौरी
ग़ज़ल
ले आया कौन गोर-ए-ग़रीबाँ में खींच कर
कोसों अभी मैं मंज़िल-ए-मक़्सद से दूर था