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ग़ज़ल
इक नाज़ भरे दिल में ये 'इश्क़ का हंगामा
इक गोशा-ए-ख़लवत में ये दश्त की पहनाई
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
ग़ज़ल
अंजुमन कैसी तुम अपनी ज़ात से हो अंजुमन
गोशा-ए-ख़लवत में भी बैठो तो इक महफ़िल बनो
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
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gosha-e-KHalvat
गोशा-ए-ख़लवतگوشَۂ خَلْوَت
एकांत का स्थान, तन्हाई की जगह
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ग़ज़ल
ऐ 'मुसहफ़ी' ज़ी-गोशा-ए-ख़लवत-बरूँ ख़िराम
ख़ालीस्त अज़-बराए तू ख़ुद जा-ए-शाएरी
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
गोशा-ए-ख़लवत दिल की फ़राग़त जोश-ए-जवानी रात सुहानी
यार बग़ल में हाथ में बोतल आज मज़ा है बादा-कशी का
रियाज़ हसन खाँ ख़याल
नज़्म
दुआ
जिन का दिल ढूँढता है गोशा-ए-ख़लवत का सुकूँ
सूरत-ए-निकहत-ए-गुल उन को परेशाँ कर दे
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
किस का चमकता चेहरा लाएँ किस सूरज से माँगें धूप
घोर अँधेरा छा जाता है ख़ल्वत-ए-दिल में शाम हुए
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
मज़ा क्या उस बुत-ए-बे-पीर से दिल के लगाने का
जो ख़ल्वत में हो बुत महफ़िल में हो तस्वीर की सूरत
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
मुद्दत में तुम मिले हो क्यूँ ज़िक्र-ए-ग़ैर आए
मैं अपने साए से भी ख़ल्वत में बद-गुमाँ हूँ