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ग़ज़ल
है नाज़-ए-मुफ़्लिसाँ ज़र-ए-अज़-दस्त-रफ़्ता पर
हूँ गुल-फ़रोश-ए-शोख़ी-ए-दाग़-ए-कोहन हुनूज़
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ईज़ा-कुशी का दौर बहार-ए-हयात है
दिल अपना गुल-फ़रोशी-ए-दाग़-ए-जफ़ा करे
अब्दुल मन्नान बेदिल अज़ीमाबादी
नज़्म
'ग़ालिब'
जो बात है वो शोख़ी-ए-गुलदस्ता-ए-चमन
जो लफ़्ज़ है बहार-ए-कफ़-ए-गुल-फ़रोश है
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
ग़ज़ल
जब से उस शोख़-ए-गुल-अंदाम को 'उर्यां देखा
फिर गुलिस्ताँ में न सो-ए-गुल-ए-ख़ंदाँ देखा
इनायत अली ख़ान इनायत
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ग़ज़ल
रहम कर ज़ालिम कि क्या बूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
नब्ज़-ए-बीमार-ए-वफ़ा दूद-ए-चराग़-ए-कुश्ता है
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
बुलबुल ओ परवाना
गिरा रहा है तिरा शौक़ शम्अ पर तुझ को
मुझे ये डर है न पहुँचे कहीं ज़रर तुझ को
सुरूर जहानाबादी
ग़ज़ल
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में सैर जो की हम ने जा-ए-गुल
छानी चमन की ख़ाक न था नक़्श-ए-पा-ए-गुल
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में सैर जो की हम ने जा-ए-गुल
छानी चमन की ख़ाक न था नक़्श-ए-पा-ए-गुल