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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
मुझे तो चश्म-ए-गुरेज़ाँ भी इल्तिफ़ात लगी
तिरे सितम पे भी ईसार का गुमाँ गुज़रा
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
मुद्दत में तुम मिले हो क्यूँ ज़िक्र-ए-ग़ैर आए
मैं अपने साए से भी ख़ल्वत में बद-गुमाँ हूँ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
रक़ीबाँ की न कुछ तक़्सीर साबित है न ख़ूबाँ की
मुझे नाहक़ सताता है ये इश्क़-ए-बद-गुमाँ अपना
मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ
ग़ज़ल
दिलों में जब गुमाँ होंगे मकीं आहिस्ता आहिस्ता
तो धुँदला जाएगा नूर-ए-यकीं आहिस्ता आहिस्ता
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
ग़ज़ल
गुमाँ होता है जिन मौजों पे इक नक़्श-ए-हुबाबी का
उन्ही सोई हुई मौजों में कुछ तूफ़ान पलते हैं
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
इस लिए ख़ुल्द में जाने का हर इक तालिब है
कि कुछ इक दूर से पड़ता है गुमान-ए-देहली
मीर मेहदी मजरूह
ग़ज़ल
घिस के संदल का लगाना जिन्हें दर्द-ए-सर था
दिल पे रखते हैं वो अंदोह-ए-गरान-ए-देहली
सय्यद मेहदी हुसैन मेहदी
ग़ज़ल
दूर से देख के हो क्यूँकि यक़ीं दिल्ली का
आ के दिल्ली में हो जब यूँ ही गुमान-ए-देहली