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ग़ज़ल
ख़ुदा रक्खे है कुछ दीवान-ए-‘साक़ी’ भी जज़ाक-अल्लाह
सलासत देखते जाओ रवानी देखते जाओ
अब्दुल ग़फ़ूर साक़ी
ग़ज़ल
लिया जाता न कैसे इम्तिहान-ए-ज़र्फ़ ऐ 'साक़ी'
नज़र हर एक बादा-ख़्वार ने साग़र पे रक्खी थी
अब्दुल हमीद साक़ी
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havaa nahii.n aa saktii
हवा नहीं आ सकती ہَوا نَہِیں آ سَکتی
किसी की पहुँच नहीं, किसी का गुज़र नहीं, किसी की रसाई नहीं
havaa nahii.n aa saktii
हवा नहीं आ सकती ہَوا نَہِیں آ سَکْتی
۔(کنایۃً) کسی کا گزر نہیں ۔ کسی کی رسائی نہیں۔؎
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ग़ज़ल
नए साग़र नया साक़ी नया अंदाज़-ए-मय-ख़ाना
क़दामत की यहाँ अब बात कुछ मानी नहीं जाती
अब्दुल ग़फ़ूर साक़ी
नज़्म
शाह साहब एण्ड संज़
ऐ सखी शहर-ए-सख़ावत में गुज़ार औक़ात कर
ऐ नज़्र वाले नज़्र ख़ैरात कर
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
इस तरह हम ने खेला ग़म-ए-ज़िंदगी का खेल
जीता भी कुछ नहीं है तो हारा भी कुछ नहीं
भगवान खिलनानी साक़ी
ग़ज़ल
इंतिज़ारी बे-क़रारी आह-ओ-ज़ारी सर-ब-सर
इस तरह दिल को जलाने का मज़ा कुछ और है
भगवान खिलनानी साक़ी
ग़ज़ल
अश्क से दरिया हुआ दरिया से तूफ़ाँ हो गया
कश्ती-ए-‘उम्र-ए-रवाँ का साज़-ओ-सामाँ हो गया