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ग़ज़ल
अल्लाह-रे उस की चौखट है बोसा-गाह-ए-आलम
कहता है संग-ए-असवद मैं संग-ए-आस्ताँ हूँ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
नज़्म
आह गोखले
अफ़्रीक़ा में न होगा फ़र्क़-ए-सपेद-ओ-असवद
लाएगी रंग ख़ूनीं तक़रीर गोखले की
ज़ाहिदा ख़ातून शरवानिया
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hajar-e-asvad
हजर-ए-असवद حَجَرِ اَسْوَد
वह काला पत्थर जो मुसलमानों के पवित्र स्थान मक्के में काबे की दीवार में है और हज की परिक्रमा में उसका चुम्बन लिया जाता है, मुसलमानों का यह विश्वास है कि यह पत्थर स्वर्ग से लाया गया है, और इसे चूमने से पापों का नष्ट होना माना जाता है
dil badsat aavar ki haj-e-akbar ast
दिल बदसत आवर कि हज-ए-अकबर अस्त دل بدست آور کہ حجِ اکبر است
win the hearts as it is the greatest virtue
har ki aamad 'imaarat-e-nau saaKHt, raft-o-manzil ba diigare pardaaKHt
हर कि आमद 'इमारत-ए-नौ साख़्त, रफ़्त-ओ-मंज़िल ब दीगरे परदाख़्त ہَر کِہ آمَد عِمارَتِ نَو ساخْت، رَفْت و مَنزِل بَہ دِیگَرے پَرداخت
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) जो आया इस ने एक नई इमारत बनाई वो चला गया और मकान किसी और का हो गया, हर एक शख़्स अपने ही ख़्याल के मुताबिक़ काम करता है नीज़ नया हाकिम नया हुक्म जारी करता है , हर शख़्स अपनी फ़हम के मुताबिक़ काम करता है
har che ba-zabaan aayad ba-ziyaa.n aayad
हर चे ब-ज़ाबान आयद ब-ज़ियाँ आयद ہَر چہ بَزَبان آیَد بَزِیاں آیَد
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) जो बात ज़बान से निकलती है वो नुक़्सान भी पहुंचाती है, बात सोच समझ कर करना चाहिए वर्ना बाद में पछताना पड़ता है
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ग़ज़ल
कशिश मर्दुम की ये है या नुमूद-ए-नज्म-ए-असवद है
वफ़ूर-ए-नूर है या इंतिहा-ए-तीरगी है ये
मोहम्मद आज़म
ग़ज़ल
और क्या का'बे में मिलता संग-ए-असवद के सिवा
ढूँढता था जिस को तू ज़ाहिद वो बुत-ख़ाने में था
प्यारे लाल रौनक़ देहलवी
ग़ज़ल
सद एहतिराम के क़ाबिल वो संग-ए-असवद है
ज़मीं पे उस के मुक़ाबिल का कोई संग न हो