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ग़ज़ल
गुज़र रहा हूँ जुनूँ की जिलौ में ऐ 'मुश्किल'
ये ज़ौक़ ले के चला है कहाँ नहीं मा'लूम
शैख़ हसन मुश्किल अफ़कारी
ग़ज़ल
दुनिया में अभी तक बाक़ी हैं जाबिर भी कई ज़ालिम भी कई
हैरत तो यही है ऐ 'मुश्किल' इंसान सभी कहलाते हैं
शैख़ हसन मुश्किल अफ़कारी
ग़ज़ल
इक तेरे ग़म से प्यार हमें क्या हुआ ऐ दोस्त
दुनिया का ग़म ख़रीद रहे हैं ख़ुशी से हम
शैख़ हसन मुश्किल अफ़कारी
ग़ज़ल
शैख़ हसन मुश्किल अफ़कारी
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mushkil-suurat-e-haal
मुश्किल-सूरत-ए-हाल مُشکِل صُورَتِ حال
stymie, stymy
mu.nh se kahnaa aasaan hai karnaa mushkil hai
मुँह से कहना आसान है करना मुश्किल है مُنہ سے کَہنا آسان ہے کَرنا مُشکِل ہے
कुछ कहना आसान है लेकिन अमल करके दिखाना मुश्किल है
haraam-KHorii mushkil se chhuTtii hai
हराम-ख़ोरी मुश्किल से छुटती है حَرام خوری مُشْکِل سے چُھٹْتی ہے
रिश्वत या सस्ती की आदत नहीं जाती
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ग़ज़ल
फ़रोग़-ए-हुस्न से होती है हल्ल-ए-मुश्किल-ए-आशिक़
न निकले शम' के पा से निकाले गर न ख़ार आतिश
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ख़ुद-कुशी शिद्दत-ए-ईज़ा-ए-वफ़ा में तौबा
बुज़दिली कहिए इसे ये हल-ए-मुश्किल न हुआ
माहिर बिलग्रामी
ग़ज़ल
अजल का काम नहीं मेरी हल्ल-ए-मुश्किल में
कि मंज़िल-ए-ग़म-ए-हस्ती से बढ़ गया हूँ मैं
हिरमाँ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
मिरा माज़ी नज़र आया मुझे हाल-ए-हसीं हो कर
जो उन के साथ देखे थे वो मंज़र याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
ग़ज़ल
आह को बाद-ए-सबा दर्द को ख़ुशबू लिखना
है बजा ज़ख़्म-ए-बदन को गुल-ए-ख़ुद-रू लिखना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अगर ज़बाँ से बयाँ हाल-ए-ग़म न हो पाया
हुज़ूर-ए-दोस्त मिरी ख़ामुशी ने साथ दिया
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ
ये मिरे वजूद की सल्तनत है अजब ज़वाल के दरमियाँ